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कांग्रेस की डगमगाती नैया के खेवैया बन गए कन्हैया

देश के लिए कन्हैया की तड़प से “अंजान” सीपीआई के एक नेता का कहना है कि कन्हैया कुमार के भीतर क्रांति की ज्वाला नहीं बल्कि सत्ता पाने की तड़प है।

JNU के पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार और राहुल गांधी.

नई दिल्ली: जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) के पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार ने शहीद-ए-आजम भगत सिंह के जन्मदिन को कांग्रेस में शामिल होने के लिए बहुत सोच विचार कर चुना था। इसका सीधा कारण है कि ‘इंकलाब की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है’ और यही वो चीज थी, जिसे कन्हैया प्रकट करना चाहते थे। कन्हैया कुमार 28 सितम्बर से पहले तक देश की सबसे पुरानी क्रांतिकारी पार्टी सीपीआई के मेंबर थे। सीपीआई ने उनको पूरे देश में क्रांति करने की पूरी छूट दे रखी थी। फिर भी कन्हैया को न जाने क्यों लगा कि सीपीआई में रहकर क्रांति करने के उनके अरमानों पर पानी फिर सकता है। 

कन्हैया ने दावा किया कि कांग्रेस में शामिल होकर वे कांग्रेस के साथ ही देश को बचाना चाहते हैं। ‘बिहार टू तिहाड़’ की यात्रा कर चुके कन्हैया का कहना है कि केवल कांग्रेस को मजबूत करके ही भारत को सशक्त बनाया जा सकता है। जबकि सीपीआई के एक नेता अतुल कुमार “अंजान” के विचार इसके ठीक उलट हैं। कन्हैया कुमार की क्रांनिकारी प्रतिभा से “अंजान” नेताजी का कहना है कि कन्हैया ने JNU के छात्रसंघ के अध्यक्ष का चुनाव सीपीआई की स्टूडेंट विंग AISF में रहकर जीता था। उनकी भीषण क्रांतिकारिता ने AISF को इतना मजबूत कर दिया कि अगले साल से उनका कोई भी उम्मीदवार चुनाव लड़ने की हालत में नहीं था। ऐसी ही मजबूती कन्हैया कांग्रेस को भी देंगे। इस मामले में उनकी प्रतिभा राहुल गांधी से किसी मायने में कमतर नहीं ठहरती।

 

 

कन्हैया कुमार ने भगत सिंह को अपना हीरो घोषित कर रखा है। भगत सिंह ने असेम्बली बम काण्ड पर हाई कोर्ट में की गई अपनी अपील में कहा था,“हम न वकील हैं, न अंग्रेजी विशेषज्ञ और न हमारे पास डिगरियां हैं। इसलिए हमसे शानदार भाषणों की आशा न की जाए।” इसके बरअक्स देखें तो कन्हैया वकील और अंग्रेजी के एक्सपर्ट भले ही न हों लेकिन उनके पास डिगरी तो है ही। देश उनसे शानदार भाषणों की आशा तो कर ही सकता है। 

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कन्हैया शानदार भाषण देने की कोशिश तो करते ही हैं। आम जनता को भी पता है कि उसका पेट भाषणों से नहीं भरता तो फिर कन्हैया का मन कैसे केवल भाषण देने से भर सकता है। वे तो कुछ ऐसा करना चाहते हैं जिससे देश को बचा सकें। कुछ कर गुजरने की तड़प और बेचैनी उनको कांग्रेस में ले गई है। कन्हैया के एक और हीरो लेनिन ने भी कहा था कि एक कदम आगे बढ़ने के लिए कभी-कभी दो कदम पीछे हटना पड़ना है। जबकि उनके भीतर की तड़प से “अंजान” लोगों का कहना है कि कन्हैया कुमार के भीतर क्रांति की ज्वाला नहीं बल्कि सत्ता पाने की तड़प है। देखते जाइए तमाशा जारी है...  
        

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