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दिल्ली दंगे में पुलिस की भूमिका निराशाजनक, पुलिस सुधार लागू हों : पूर्व आईपीएस प्रकाश सिंह

फरवरी 2020 के दंगे से निपटने में दिल्ली पुलिस की भूमिका को निराशाजनक बताते हुए Up के पूर्व DGP प्रकाश सिंह ने पुलिस सुधारों को पूरी तरह से लागू करने की एक बार फिर वकालत की है।

पूर्व आईपीएस प्रकाश सिंह (फाइल फोटो)

नई दिल्ली (एजेंसी) : उत्तर पूर्वी दिल्ली में हुई सांप्रदायिक हिंसा से निपटने में दिल्ली पुलिस की भूमिका को निराशाजनक बताते हुए उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक और केन्द्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ) के पूर्व महानिदेशक प्रकाश सिंह ने पुलिस की कार्यशैली पर निराशा व्यक्त की है। साथ ही उन्होंने पुलिस सुधारों को पूरी तरह से लागू करने की एक बार फिर जोरदार वकालत की है।

हालिया साम्प्रदायिक हिंसा के दौरान दिल्ली पुलिस पर मूक दर्शक बने रहने के आरोपों के संबंध में प्रकाश सिंह ने कहा कि पुलिस की भूमिका निराशाजनक रही है। उसके कारणों के बारे में अभी तो साफ-साफ नहीं कहा जा सकता है। लेकिन मोटे तौर पर एक गंभीर स्थिति का सामना करते हुए नेतृत्व को जो फैसला लेना चाहिए था, वे नहीं ले पा रहे थे। उन्होंने कहा, ‘‘इसका एक सीधा-सा तरीका है कि जब कहीं स्थिति बिगड़ने का संकेत मिलता है या प्रभाव भी दिखता है तो उसी समय उसे दबा दीजिए। गिरफ्तारी कीजिए, अमन कमेटी बनाइए, गश्त लगाइए, छानबीन करिए, जब्ती कीजिए... यही सब होता है। यह सवाल दिल्ली पुलिस से पूछा जाना चाहिए कि आपमें इतनी निष्क्रियता क्यों आ गई है?’’
 
जामिया, जेएनयू, सीएए संबंधी प्रदर्शनों से निपटने के तौर तरीक़े पर दिल्ली पुलिस की भूमिका की काफ़ी आलोचना हुई है। इस सवाल पर कि क्या इससे निपटने का कोई और तरीक़ा हो सकता था पूर्व आईपीएस प्रकाश सिंह ने कहा, ‘‘पुलिस के लिये सबसे सशक्त हथियार नागरिकों का भरोसा एवं विश्वास होता है। नागरिक आपके ऊपर भरोसा तभी करेंगे जब आप उचित तरीके से काम करेंगे। ऐसे में लोगों को साथ लें। सामान्य जनता के प्रति संवेदनशील बनने के साथ विश्व में प्रचलित सर्वोतम पुलिस प्रथाओं का अनुकरण करने की आवश्यकता है। यही तरीका है। ’’ 

उल्लेखनीय है कि 2006 में पुलिस सुधार को लेकर उच्चतम न्यायालय ने महत्वपूर्ण दिशा निर्देश दिए थे। और पुलिस सुधार आयोग ने भी कुछ सिफारिशें की थीं। इन पर अमल संबंधी सवाल पर उन्होंने कहा, ‘‘ ऐसा नहीं है कि पुलिस सुधार की दिशा में बिल्कुल भी काम नहीं किया गया है। कुछ काम हुआ है लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। ऐसा भी नहीं है कि पुलिस सुधार कर दिया जाए तो ‘रामराज्य’हो जाएगा लेकिन हिंसा से निपटने के लिए आपके पास जो मशीनरी है, वह बेहतर तरीके से काम करेगी।’’ 

प्रकाश सिंह कहते हैं, दरअसल, पुलिस सुधार का मतलब यह है कि नीति निर्माता यह तय कर दें कि पुलिस कौन-से कानून से चलेगी? किस सिद्धांत का पालन करेगी? उसकी भूमिका क्या होगी? उसके ऊपर जिम्मेदारी क्या रहेंगी ? उसके बाद पुलिस अपने हिसाब से काम करेगी और उसके ऊपर किसी तरह का दबाव नहीं डाला जाएगा। इन बातों पर ध्यान दिया जाना चाहिए। 

उत्तर पूर्वी दिल्ली में हिंसा के दौरान पुलिस पर एक संप्रदाय विशेष के ख़िलाफ़ उपद्रवियों का साथ देने के आरोपों पर उनकी राय पूछे जाने पर प्रकाश सिंह ने कहा कि यह तो जांच का विषय है। लेकिन इन सभी परिस्थितियों के लिये पुलिस तंत्र को आधुनिक, मजबूत एवं व्यवस्थित बनाने की जरूरत है क्योंकि भारत में पुलिस बल की संरचना या फिर अनुसंधान का तरीक़ा, वह उपनिवेशकालीन ही है।

भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिये कौन से तत्कालिक एवं दीर्घकालिक कदम उठाये जाने चाहिए, इस सवाल पर उन्होंने कहा, ‘‘पुलिस सुधार एवं आधुनिकीकरण इसके महत्वपूर्ण पहलू हैं । यह पहले भी कहा गया है कि किसी राज्य के पुलिस प्रमुख का कार्यकाल एक निश्चित समय के लिये सुनिश्चित हो और कार्य की स्वतंत्रता को प्रोत्साहन दिया जाए। पुलिस के कामकाज में किसी प्रकार का बाहरी हस्तक्षेप न हो। प्रत्येक राज्य में पुलिस सुधार आयोग की स्थापना की जाए। प्रदेशों में थाना प्रभारी से लेकर पुलिस प्रमुख तक का एक स्थान पर कार्यकाल दो वर्ष सुनिश्चित करने के सुझाव आदि पर अमल हो।’’

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उल्लेखनीय है कि दिल्ली हाईकोर्ट (Delhi High Court) ने फरवरी 2020 में पूर्वी दिल्ली में हुए दंगे के बारे में कहा है कि ये दंगे पूरी तरह सुनियोजित साजिश के तहत हुए थे। दंगों से पहले पूरे इलाके के सीसीटीवी को निष्क्रिय कर दिया गया था। जो साफ इशारा करता है कि दंगे की योजना पहले से ही तैयार कर ली गई थी।      

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