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गोवर्धन पूजा है शुभ योग, गोबर से गोवर्धन पर्वत बनाकर पूजा करने की है परंपरा

गोवर्धन पूजा पर्व पर गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत बनाया जाता है। पर्वत के शिखर पर श्री गोवर्धन जी स्थापित किए जाते हैं। इस दिन लोग अपने पालतू पशुओं को सजाया जाता है।

प्रतीकात्मक तस्वीर

आज  है कार्तिक शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि। सनातन धर्म में कार्तिक शुक्ल पक्ष पर पड़ने वाले प्रतिपदा का विशेष महत्व है। इस दिन गोवर्धन पर्वत की पूजा करने की परंपरा है। ये दिन जैन और गुजराती नववर्ष के रूप में भी मनाया जाता है। आज प्रतिपदा पूरे दिन रहेगी। इस दिन मातंग, आयुष्मान और सौभग्य नाम के शुभ योग भी बने हैं।

गोवर्धन पूजा पर्व पर गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत बनाया जाता है। पर्वत के शिखर पर श्री गोवर्धन जी स्थापित किए जाते हैं। इस दिन लोग अपने पालतू पशुओं को सजाया जाता है। नवीन फसलों से बने व्यंजनों का भोग गोवर्धन पर्वत को लगाया जाता है। ये प्रकृति, पशु, परमात्मा और मनुष्यों के बीच प्रेम और सम्मान बनाए रखने का पर्व है। आज दिन पूजा के लिए किसान और पशुपालक खासतौर पर तैयारी करते हैं। घर के आंगन या खेत में गाय के गोबर से देवता बनाए जाते हैं और उन्हें भोग भी लगाया जाता है। गोवर्धन देव के साथ ही इस दिन भगवान श्रीकृष्ण का दूध से अभिषेक किया जाता है।

गोवर्धन पूजा का शुभ मुहूर्त 

गोवर्धन पूजा प्रात: काल –06:36 से  सुबह 8: 47 तक 
गोवर्धन पूजा शाम में –3 बजकर 22 मिनट से शाम 5 बजकर 33 मिनट तक है 

गोवर्धन पूजा की विधि

सबसे पहले आंगन में गोबर से गोवर्धन का चित्र बनाते है... इसके बाद रोली, चावल, खीर, बताशे, जल, दूध, पान, केसर और फल, फूल से पूजन करें। पूजन के वक्त दीपत जरूर जलाएं। कहा जाता है अस दिन पूजा करने से साल भर भगवान श्री कृष्ण की कृपा बनी रहती है। आज के दिन भगवान को 56 भोग लगाने की परंपरा है।  आखिर में प्रभु श्री कृष्ण की आरती करें। 

गोवर्धन पूजा की कथा

द्वापर में भगवान श्रीकृष्ण माता यशोदा और नंदबाबा के साथ ब्रज में रहते थे। माना जाता है कि उस समय अच्छी बारिश के लिए सभी लोग भगवान इंद्र का पूजन करते थे। एक बार भगवान श्रीकृष्ण ने तय किया कि वो इंद्र का घमंड तोड़ेंगे। श्रीकृष्ण ने गांव के लोगों से कहा कि वे इंद्र का पूजन न करें, बल्कि गोवर्धन पर्वत की पूजा करें। सभी ने कान्हा की बात मान ली, लेकिन ऐसा करने से इंद्रदेव गुस्सा हो गए और उन्होंने तेज बारिश शुरू कर दी। ब्रजवासियों की रक्षा के लिए कन्हैया ने गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठा लिया और सभी लोगों ने इस गोवर्धन पर्वत के नीचे शरण ली। माना जाता है उसके बाद से ही गोवर्धन पूजा की परंपरा शुरू हुई है।

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