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News India Exclusive 'ऑपरेशन अंगूठा' : हिन्दू शरणार्थियों की मदद के नाम पर धर्मांतरण का खेल

पाकिस्तान से आए हिन्दुओं के एक शरणार्थी कैंप के पास गौशाला संभाल रही उर्मिला रानी साफ कहती हैं कि गुपचुप तरीके से यहां धर्मांतरण का खेल चल रहा है।

ऑपरेशन अंगूठा

नई दिल्ली : पाकिस्तान से आए और दिल्ली में अभावों की ज़िंदगी जीते हिंदू शरणार्थियों पर सरकारों की नजरें तो नहीं पड़ी लेकिन नॉन गवर्नमेंट ऑर्गेनाइजेशन यानी एनजीओज को यहां अपने लिए संभावनाएं नजर आने लगी हैं। फिर भी इन भोले-भाले हिंदू शरणार्थियों को समझ में नहीं आता कि सुविधाएं देने से पहले इनसे कागजों पर अंगूठा क्यों लगवाया जाता है। इनकी पहचान से जुड़ी सूचनाओं की साझेदारी इन्हें डरा देती है। हद तो तब होती है जब हिंदू शरणार्थियों के लिए लाया गया समानों से लदा ट्रक अंगूठे का निशान देने से इंकार करने पर वापस भेज दिया जाता है।

गुपचुप तरीके से चल रहा धर्मांतरण का खेल
 
शरणार्थी कैंप के पास सालों से मंदिर की देख रेख और गौशाला का संचालन संभाल रही उर्मिला रानी को लोग माताजी कहते हैं। वह साफ कहती हैं कि गुपचुप तरीके से यहां धर्मांतरण का खेल चल रहा है। अब तक 3 लोगों का धर्म परिवर्तन करने का दावा किया जा रहा है। शुरुआती दिनों में उन्होंने ऐसे लोगों को यहां आने से रोका लेकिन कुछ दिनों के बाद वही लोग नई संस्था के नाम से यहां सक्रिय हो गए। मंदिर से जुड़े अन्य साधु-संतों का भी यही कहना है कि इन गरीब, मजबूर पाकिस्तानी हिन्दुओं पर धर्म परिवर्तन का बहुत दबाव है। जिससे इंकार करने का मतलब अपनी रोटी के लिए संकट पैदा करना हो गया है।

क्रिसमस करो सेलिब्रेट, रामलीला बंद  

पाकिस्तान से आए इन हिन्दुओं के लिए यहां इंडिया में हिन्दू त्योहार मनाने का एहसास बेहद खास है। यहां बिना किसी डर भय के वे अपनी भक्ति का इजहार कर सकते हैं। अपने उत्सवों को खुशी-खुशी सेलिब्रेट कर सकते हैं। लेकिन हैरानी होती है जब यहां काम करने वाली कुछ संस्थाएं लोगों को क्रिसमस सेलिब्रेट करने के लिए तो प्रोत्साहित करती हैं लेकिन रामलीला के आयोजन के लिए मना कर देती हैं।

पाकिस्तानी हिन्दुओं के शरणार्थी कैंप की हालत उस शोकेस की तरह हो गई है। जो धर्म के धंधेबाजों को तो आकर्षित कर ही रही है, साथ ही ऐसी संस्थाओं के लिए भी फायदे का सौदा साबित हो रही है जो यहां सुविधा और दान के नाम पर फंड तो काफी जुटाते हैं लेकिन ग्राउंड ज़ीरो पर उसका असर नहीं दिखता। कोई कैंप में सोलर लैंप देने के नाम पर फंड इकट्ठा कर रहा है तो कोई किताबें बांटने के नाम पर, कोई शौचालय बनवाने के नाम पर फंड इकट्ठा कर रहा है तो कोई साफ-सफाई के नाम पर।

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सरकारों की बेरुखी से पस्त हुए हिन्दू शरणार्थी
 
पाकिस्तान के कट्टरपंथी मुल्लाओं की बर्बरता इन्हें परास्त नहीं कर सकी। लूट-खसोट हर तरह की ज्यादती इनके मनोबल को तोड़ नहीं सकी। क्योंकि इन्हें अपना धर्म प्यारा है, हिन्दू धर्म से जुड़ाव और समर्पण इनकी ताकत बनती रही है, इनके हौसले को बुलंद करती रही है। लेकिन यहां दिल्ली में पहले सरकारों की बेरुखी और फिर कोरोना महामारी की मार ने इनके वजूद को ही हिला कर रख दिया है। पाकिस्तान से आए इन बेहद मजबूर हिन्दुओं का दावा है कि मदद के नाम पर जिस संदिग्ध तरीके से डाटा कलेक्शन पर जोर दिया जाता है, वह साफ संकेत देता है कि खेल कुछ और है। भारत में भी धर्म परिवर्तन के खतरे को इतनी बड़ी चुनौती के रूप में देखकर इनका हौसला लड़खड़ाने लगा है। आने वाले समय में अगर सरकारों के साथ हिन्दुस्तान की आम जनता ने आगे बढ़कर इनका हाथ नहीं थामा तो सनातन धर्म के इन लोगों के लिए अपना धर्म बचाना मुश्किल होगा।

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