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News India Exclusive 'ऑपरेशन अंगूठा' : पाकिस्तान से आए हिन्दू शरणार्थियों के सामने 'धर्म बचाने का संकट'

पाकिस्तान से अपना धर्म बचाने की उम्मीद में भारत आए हिन्दू शरणार्थियों को ईसाई बनाने की साज़िश रची जा रही है। इनको मदद के नाम पर धर्म-परिवर्तन के लिए तैयार किया जा रहा है।

ऑपरेशन अंगूठा

नई दिल्ली : वो शरणार्थी जो पाकिस्तान से अपना धर्म बचाने की उम्मीद में हिन्दुस्तान आए हैं, यहां भी उनके साथ जो बर्ताव हो रहा है वो परेशान करने वाला है। पाकिस्तान से आए हिन्दुओं पर धर्म परिवर्तन कराने वाले गिद्धों की काली निगाहें लग गईं हैं। पाकिस्तान से इन हिन्दुओं को गरीबी, बदहाली ने इस कदर परेशान किया कि ज़िंदगी बदतर लगने लगी। अपने धर्म पर आए संकट ने इन्हें सब समेट कर हिन्दुस्तान आने को मजबूर कर दिया। पाकिस्तान में हिंदुओं की बहू-बेटियों की इज्जत पर होने वाले हमले और जबरन होने वाले धर्म परिवर्तन ने इन्हें अपना घर-बार छोड़ने पर मजबूर कर दिया। लेकिन इन्हें तो अंदाजा भी नहीं था कि यहां राजधानी दिल्ली में संसद और विधान सभा से बस चंद किलोमीटर की दूरी पर दिल्ली के बेहद खास सिग्नेचर ब्रिज से सटे इलाके में उन्हें छत तो नसीब हो जाएगी, पर इस छत के नीचे उनका धर्म महफूज रह पाएगा, इसकी गारंटी नहीं है।

सरकार की नाक के नीचे धर्म के धंधेबाजों का जाल 

सरकार की नाक के नीचे धर्म के धंधेबाजों ने अपना जाल बिछाना शुरू कर दिया है। इन हिन्दू शरणार्थियों की बेबसी और गरीबी का फायदा उठाकर इनका डाटा बेस बनाया जाने लगा है। जिस हिन्दुत्व की लड़ाई में ये लोग अब तक नहीं हारे, पाकिस्तान के नापाक इरादों से मुकाबला किया,  आतंक के आकाओं से सीना खोल कर टकराए, आज भूख और बेबसी की वजह से ये कमजोर पड़ने लगे हैं। इन हिन्दू शरणार्थियों के धर्म परिवर्तन की साज़िश बुनी जा रही है। हिन्दू शरणार्थियों को मदद के नाम पर धर्म-परिवर्तन के लिए तैयार किया जा रहा है। 

शरणार्थी हिन्दुओं की बदहाली ने दिया मौका

धर्म के धंधेबाजों का पूरा खेल अब सामने आने लगा है। भूख, गरीबी, अशिक्षा, बेबसी, बदहाली जिसे देखकर हम और आप परेशान हो उठते हैं, उसमें कुछ लोगों को अपने लिए एक मौका नज़र आने लगता है। ये मौका धर्म के विस्तार, धर्म परिवर्तन का है। पाकिस्तान के सताए इन मजबूर हिन्दुओं का सामना यहां भी धर्म के धंधेबाजों से होगा, ऐसा इन्होंने सोचा भी नहीं था। पाकिस्तान में तो इनके लिए खतरा कहीं बड़ा और खूनी था। धर्म बदलने का खेल वहां खुलेआम चल रहा था। कुछ कट्टरपंथी सीधे हिन्दू घरों पर हमला करते और बहू बेटियों को उठा कर ले जाते, छोटी-छोटी लड़कियों का निकाह करवा कर धर्म बदल देते, पाकिस्तान में कुछ संगठनों का टारगेट तो हिन्दू नस्ल को खत्म कर देने का है।

हर सामान देने के बदले मांगते अंगूठे का निशान  

सवाल तब बड़ा हो जाता है जब हिन्दुस्तान में भी ऐसी ही साजिश के जाल बुने जाने लगते हैं। यहां ऐसे कट्टरपंथियों के तेवर अलग हैं, तरीके अलग हैं। यहां हिंदू शरणार्थियों का सामना धर्म के उन साइलेंट धंधेबाजों से है जो प्यार से रोटी पकड़ाने आते हैं। दुहाई भूख को मिटाने की देते हैं और रोटी से पहले अंगूठा रजिस्टर पर लगवा लेते हैं। दुहाई नंगे बदन को ढंकने की देते हैं और कपड़े देने से पहले रजिस्टर पर साइन ले लेते हैं। जिन लोगों ने धर्म बचाने के लिए अपना देश छोड़ा, उन्हें अपना धर्म बचाने की जद्दोजहद करनी पड़ रही है। भूख ऐसी कि एनजीओ वाले जब राशन के बदले अंगूठे का निशान मांगते हैं तो ये लोग दुविधा में पड़ जाते हैं। 

दिल्ली में हिन्दू शरणार्थियों की कई बस्तियां

पाकिस्तान में इन लोगों ने अपने धर्म की लड़ाई लड़ी, अब यहां भी ऐसी ही एक और जंग लड़नी पड़ रही है। हिन्दू धर्म वहां खतरे में था, हिन्दू धर्म छीने जाने का डर वहां था, अब ऐसा ही डर यहां भी सता रहा है। दरअसल जब पाकिस्तान छोड़कर ये हिन्दू शरणार्थी देश की राजधानी दिल्ली पहुंचे तो इनकी संख्या के लिहाज से बस्तियां बसाईं गईं।दिल्ली के अलग अलग इलाकों में पाक हिन्दू शरणार्थी कैंप बनाये गये। शरणार्थियों का बड़ा कैंप मजनू का टीला इलाके में है जहां 450 से 500 तक परिवार रहते हैं। दूसरा कैंप सिग्नेचर ब्रिज के पास है, जहां 70 से 75 परिवार रहते हैं। तीसरा कैंप आदर्श नगर इलाके में है, जहां 500 के करीब परिवार रहते हैं।

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न्यूज़ इंडिया ने उजागर की सच्चाई  

पाकिस्तान से आए इन हिंदू शरणार्थियों की जिस दबी हुई सच्चाई को न्यूज़ इंडिया सामने ला रहा है, उस पर लोकल इंटेलीजेंस की नज़र होनी चाहिए। उस पर सरकारी एजेंसियों की नजर होनी चाहिए। ये बात समझ से परे है कि सालों से जो हिन्दू शरणार्थी बद से बदतर जिंदगी जी रहे हैं, उनके नाम पर लाखों-करोड़ों की फंडिंग तो हो रही है पर इन शरणार्थियों की जिंदगी में कोई बदलाव क्यों नहीं आ रहा। पाकिस्तान से चल कर तमाम तरह की परेशानियों का सामना कर के ये शरणार्थी दिल्ली में बने कैंप तक तो पहुंच गए, लेकिन यहां सरकार की तरफ से किसी भी तरह की व्यवस्था नहीं दी गई। न रहने और खाने की व्यवस्था की गई और न ही पानी और बिजली का प्रबंध किया गया। यही वजह है कि इन गरीब और मजबूर परिवारों की निर्भरता दान दाताओं पर बढ़ती चली गई।

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