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गांधी परिवार की गणेश परिक्रमा : पार्टी पर राजीव गांधी की पकड़ रही कायम

राजीव गांधी के पुराने दोस्तों की एक मंडली थी, जो पीएम बनने के बाद भी उनको घेरे रहती थी। इसके सदस्यों को लगता था कि भारत के पिछड़ेपन का कारण नेताओं का नई तकनीक से नावाकिफ होना है।

राजीव गांधी

नई दिल्ली: इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजनीति में नए और नौसिखिए माने जाने वाले राजीव गांधी को प्रधानमंत्री और कांग्रेस के अध्यक्ष का पद संभालने का मौका मिला। सहानुभूति की प्रचंड लहर पर सवार राजीव गांधी को शुरू में किसी से कोई खास चुनौती नहीं मिली। सरकार में उनके पास प्रचंड बहुमत था। कांग्रेस में सत्ता की करीबी से कामयाबी के फार्मूले को जानने वाले लोग उनके आसपास पहुंचने की कोशिश में लग गए थे। 

अपने शासन काल के शुरुआती समय में राजीव गांधी को मिस्टर क्लीन कहा जाता था। राजीव गांधी ने अपनी ये छवि युवावस्था में इंदिरा गांधी के शासन काल में सरकार से पूरी तरह दूरी रखकर बनाई थी। राजनीति में आने के बाद भी उनकी ये छवि कायम रही। प्रसिद्ध साहित्यकार और पत्रकार कमलेश्वर के लिखे भाषणों को जब राजीव गांधी पार्टी के मंचों से पढ़ते थे तो नौजवानों को लगता था कि देश में नया युग आने वाले है। ‘सत्ता के दलालों को दूर करना है’ और ‘दिल्ली से भेजे एक रुपये में केवल 15 पैसा लोगों तक पहुंचता है’ जैसे जुमले लोगों के दिल और दिमाग पर छा गए थे।  

अपनी तमाम मासूमियत के बावजूद राजीव गांधी के पुराने दोस्तों की एक मंडली थी, जो प्रधानमंत्री बनने के बाद भी उनको घेरे रहती थी। इसके सदस्यों को लगता था कि भारत के पिछड़ेपन का कारण पुराने नेताओं का नई तकनीक से नावाकिफ होना है। देश को 21वीं सदी में ले जाने के वादे के साथ कांग्रेस में राजीव की मंडली हावी होने लगी। पुराने नेताओं में इसको लेकर बेचैनी स्वाभाविक थी। सत्ता संभालने के कुछ समय बाद ही राजीव गांधी के अहसास हो गया कि वे एक ऐसी जगह पहुंच गए हैं, जहां खेल के नियम पूरी तरह अलग हैं।

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बोफोर्स के हंगामे और अपनी बाल मंडली में शामिल अमिताभ बच्चन को लेकर विश्वनाथ प्रताप सिंह के साथ राजीव गांधी का पहले मनमुटाव और बाद में अलगाव हुआ। राजीव गांधी को सरकार में कोई खास चुनौती नहीं थी। पार्टी से वीपी सिंह के साथ उनके समर्थक बाहर जरूर गए, लेकिन कांग्रेस के भीतर राजीव को कोई खास खतरे का सामना नहीं करना पड़ा। 

मितभाषी और मृदुभाषी राजीव गांधी अपने बाद के दिनों में समझ गए कि राजनीति एक टफ जाब है। जिसमें सज्जनता के लिए शायद ही कोई जगह है। बाद में राजीव गांधी ने अपनी मित्र मंडली से किनारा करने का काम बखूबी किया। इससे काफी हद तक उनको राजनीति में ठोस जमीन पर आने में मदद मिली।1989 के चुनाव में उनको भले ही हार मिली लेकिन अपनी मृत्यु तक राजीव गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष के पद पर कायम रहे।    
 

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